Day 1

इश्क़ में एतदाल का क़ायल नहीं हूँ मैं 

इश्क़ है तो इबादत हो 

नमाज़ों में रो रो कर मुझे याद करे तू 
सजदे मेरे नाम के बेहिसाब  करे तू 
मैं जो बोलूं रात है तो कोई भी पहर हो 
अपनी नींद जला कर उसे रात करे तू 

इश्क़ है तो मुकम्मल हो 
मैं हूँ, तो बस मैं ही 
जहाँ हो दूसरा कोई, वहां मैं नहीं 
मैं अव्वल, मैं ही आख़िर 
मैं अहद, मैं ही नाज़िर 

जो मुझे मानता है तू 
मेरी मानता क्यों नहीं 
मुझे पाने की जुस्तुजू है अगर 
मुझसे मांगता क्यों नहीं 

इश्क़ जो करता है तू 
इश्क़ है तो ज़ाहिर हो 

तेरे माथे पर मेरी का बंदगी का निशाँ हो 
सिर्फ़ शहादत काफी नहीं सिर्फ इक़रार काफी नहीं 
तुझे इश्क़ है तो ज़ाहिर कर 
ज़माने से डर कर गुनाह होता है 
मुझे जब मानते है तू  
 मेरी मानने में हया कैसी 

हाँ अगर इश्क़ नहीं मुझसे 
फिर बात ही क्या है 
मुझे पुकार भी तू 
जो ईमान लाया है मुझ पर 
जो यक़ीन है मेरी ज़ात पर 
दूसरों को नकार भी तू 

Comments

Popular posts from this blog